Category Archives: अध्यात्म

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देवोत्थान, प्रबोधिनी या देव उठनी एकादशी

देवोत्थान, प्रबोधिनी या देव उठनी एकादशी
यह तो प्रसिद्ध ही है कि आषाढ़ शुक्ल से कार्तिक शुक्ल एकादशी पर्यन्त ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, अग्नि, वरुण, कुबेर, सूर्य और सोमादि देवों से वन्दित जगन्निवास, योगेश्वर क्षीरसागर में शेषशय्या पर चार मास शयन करते हैं और भगवद्भक्त उनके शयनपरिवर्तन और प्रबोध के यथोचित कृत्य दत्तचित होकर यथासमय करते हैं। [...]

प्रार्थना

प्रार्थना
“ॐ वाङ्मे मनसि प्रतिष्ठिता, मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः। अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यृतं वदिष्यामि सत्यं वदिष्यामि। तन्मामवतु। तद् वक्तारमवतु। अवतु माम्। अवतु वक्तारमवतु वक्तारम्। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्ति।।”
(ऋग्वेदीय शान्तिपाठ)
‘हे सच्चिदानन्दस्वरुप परमात्मन्, मेरी वाणी मन में स्थित हो जाये और मन वाणी में स्थित हो जाये। हे प्रकाशस्वरुप परमेश्वर, आप मेरे [...]

प्रदोष-लक्ष्मी-पूजन

प्रदोष-लक्ष्मी-पूजन
सायं-काल यथा-शक्ति पूजा-सामग्री को एकत्र कर पवित्र आसन पर बैठे। आचमन कर दाएँ हाथ में जल-अक्षत-पुष्प लेकर संकल्प करे। यथा- ॐ अस्य रात्रौ आश्विन-मासे-शुक्ल-पक्षे पूर्णिमायां तिथौ अमुक-गोत्रस्य अमुक-शर्मा (वर्मा या दासः) मम सकल-दुःख-दारिद्र्य-निरास-पूर्वक लक्ष्मी-इन्द्र-कुबेर-पूजनं अहं करिष्यामि (करिष्ये।
इसके बाद पूजा-स्थान के द्वार पर एक अष्ट-दल-कमल बनाए और उस पर पुष्प-अक्षत चढ़ाकर ‘द्वार-देवताभ्यो नमः’ कहकर पूजा करे। [...]

श्रीविचित्र-वीर-हनुमन्-माला-मन्त्र

श्रीविचित्र-वीर-हनुमन्-माला-मन्त्र
प्रस्तुत ‘विचित्र-वीर-हनुमन्-माला-मन्त्र’ दिव्य प्रभाव से परिपूर्ण है। इससे सभी प्रकार की बाधा, पीड़ा, दुःख का निवारण हो जाता है। शत्रु-विजय हेतु यह अनुपम अमोघ शस्त्र है। पहले प्रतिदिन इस माला मन्त्र के ११०० पाठ १० दिनों तक कर, दशांश गुग्गुल से ‘हवन’ करके सिद्ध कर ले। फिर आवश्यकतानुसार एक बार पाठ करने पर ‘श्रीहनुमानजी’ रक्षा [...]

कलश एवं जयन्ती का माहात्म्य

कलश एवं जयन्ती का माहात्म्य
माँ दुर्गा की पूजा का शुभारम्भ ‘कलश’-स्थापना से होता है। स्थापना हेतु ‘कलश’ स्वर्ण, चाँदी, पीतल, ताम्र अथवा मिट्टी का होना चाहिए। ‘कलश’ देखने में सुडौल और पवित्र होने चाहिए। मिट्टी के ऐसे ‘कलश’ प्रयोग में नहीं लाने चाहिए, जिनमें छिद्र होने की सम्भावना हो।विशेष अनुष्ठान करना हो, तो धातु के [...]

सर्वाभीष्टप्रद-प्रयोग

सर्वाभीष्टप्रद-प्रयोग
‘कुमारी-पूजन’ का प्रस्तुत प्रयोग अनुभूत सिद्ध प्रयोग है। सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्णता इस ‘प्रयोग’ द्वारा सम्भव है।
१॰ पहले संकल्प करे। यथा- ॐ तत् सत्। अद्यैतस्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय प्रहरार्धे, श्री श्वेत-वाराह-कल्पे, जम्बु-द्वीपे, भरत-खण्डे, अमुक-प्रदेशान्तर्गते, अमुक पुण्य-क्षेत्रे, कलियुगे, कलि-प्रथम-चरणे, अमुक-नाम-सम्वत्सरे, अमुक-मासे, अमुक-पक्षे, अमुक-तिथौ, अमुक-वासरे, अमुक-गोत्रोत्पन्नो, अमुक-नाम-शर्माऽहं (वर्माऽहं, दासोऽहं वा), सर्वापत् शान्ति-पूर्वक ममाभीष्ट-सिद्धये, गणेश-वटुकादि-सहितां कुमारी-पूजां करिष्ये।
२॰ [...]

ध्यान का महत्त्व

ध्यान का महत्त्व
आप सभी ने प्रायः देखा होगा की मन्त्र जप करने से पूर्व शास्त्रों में विनियोग, न्यास, ध्यान आदि का वर्णन होता है। इनका क्या प्रयोजन है?
ध्यान-
स्थूल ध्यान द्वारा सूक्ष्म का बोध होता है। ‘कुलार्णव तन्त्र’ में स्पष्ट कहा गया है कि -’जिस प्रकार गायों के सारे शरीर में व्याप्त दूध उनके स्तन से [...]

श्रीगणपति-स्तवन

श्रीगणपति-स्तवन
“ॐ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम्।
ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः श्रृण्वन्नूतिभिः सीद् सादनम्।।”   (ऋग्वेद २।२३।१)
वसु, रुद्र, आदित्य आदि गणदेवों के स्वामी, ऋषिरुप, कवियों में वन्दनीय, दिव्य अन्न-सम्पत्ति के अधिपति, समस्त देवों में अग्रगण्य तथा मन्त्र-सिद्धि के प्रदाता हे गणपति, यज्ञ, जप तथा दान आदि अनुष्ठानों के माध्यम से हम आपका आह्वान करते हैं। आप [...]