देवोत्थान, प्रबोधिनी या देव उठनी एकादशी

देवोत्थान, प्रबोधिनी या देव उठनी एकादशी
यह तो प्रसिद्ध ही है कि आषाढ़ शुक्ल से कार्तिक शुक्ल एकादशी पर्यन्त ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, अग्नि, वरुण, कुबेर, सूर्य और सोमादि देवों से वन्दित जगन्निवास, योगेश्वर क्षीरसागर में शेषशय्या पर चार मास शयन करते हैं और भगवद्भक्त उनके शयनपरिवर्तन और प्रबोध के यथोचित कृत्य दत्तचित होकर यथासमय करते हैं।
यद्यपि भगवान् क्षणभर भी सोते नहीं हैं, तथापि ‘यथा देहे तथा देवे’ माननेवाले उपासकों को शास्त्रीय विधान अवश्य करना चाहिये। यह कृत्य कार्तिक शुक्ल एकादशी को रात्रि के समय किया जाता है।
इस व्रत के दिन नारियाँ स्नानादि से निवृत्त होकर आंगन में चौक पूरकर विष्णु भगवान् के चरणों को कलात्मक ढंग से अंकित करती हैं। विष्णु भगवान् के चरणों को तेज धूप में ढक दिया जाता है। प्रातःकाल उन्हें जगाने से पूर्व रात्रि में विधिवत पूजन किया जाता है। बहुत-सी महिलाएं इस रोज घर की सफाई करके आंगन या ओखली में एक बड़ा-सा चित्र बनाती हैं। इसके पश्चात् फल, सिंघाड़ा, गन्ना तथा पकवान आदि भगवान् को समर्पित कर एक डालिया से ढक दिये जाते हैं। एक दीपक रात भर निरन्तर जलता रहता है। रात को ही व्रत की कथा सुनी जाती है। लोक-व्यवहार में इसके बाद ही मांगलिक कार्य आरम्भ होते हैं। इस दिन व्रत के रुप में उपवास करने का विशेष महत्त्व है। उपवास न कर सके तो एक समय फलाहार करना चाहिये और संयम-नियमपूर्वक रहना चाहिये। इस तिथि को रात्रि-जागरण का भी विशेष महत्त्व है।
हरि को जगाने के लिये (१) भगवत्सम्बन्धी कीर्तन, वाद्य, नृत्य और पुराणों का पाठ करना चाहिये। धूप, दीप, नैवेद्य, फल और अर्घ्य आदि से पूजा करके घंटा, शंख, मृदंग आदि वाद्यों की मांगलिक ध्वनि तथा निम्म मन्त्रों द्वारा भगवान् को जागने की प्रार्थना करे-
“उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पते।
त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेसिसम्।।
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ वाराह दंष्ट्रोद्धृतवसुन्धर

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