देवोत्थान, प्रबोधिनी या देव उठनी एकादशी
यह तो प्रसिद्ध ही है कि आषाढ़ शुक्ल से कार्तिक शुक्ल एकादशी पर्यन्त ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, अग्नि, वरुण, कुबेर, सूर्य और सोमादि देवों से वन्दित जगन्निवास, योगेश्वर क्षीरसागर में शेषशय्या पर चार मास शयन करते हैं और भगवद्भक्त उनके शयनपरिवर्तन और प्रबोध के यथोचित कृत्य दत्तचित होकर यथासमय करते हैं।
यद्यपि भगवान् क्षणभर भी सोते नहीं हैं, तथापि ‘यथा देहे तथा देवे’ माननेवाले उपासकों को शास्त्रीय विधान अवश्य करना चाहिये। यह कृत्य कार्तिक शुक्ल एकादशी को रात्रि के समय किया जाता है।
इस व्रत के दिन नारियाँ स्नानादि से निवृत्त होकर आंगन में चौक पूरकर विष्णु भगवान् के चरणों को कलात्मक ढंग से अंकित करती हैं। विष्णु भगवान् के चरणों को तेज धूप में ढक दिया जाता है। प्रातःकाल उन्हें जगाने से पूर्व रात्रि में विधिवत पूजन किया जाता है। बहुत-सी महिलाएं इस रोज घर की सफाई करके आंगन या ओखली में एक बड़ा-सा चित्र बनाती हैं। इसके पश्चात् फल, सिंघाड़ा, गन्ना तथा पकवान आदि भगवान् को समर्पित कर एक डालिया से ढक दिये जाते हैं। एक दीपक रात भर निरन्तर जलता रहता है। रात को ही व्रत की कथा सुनी जाती है। लोक-व्यवहार में इसके बाद ही मांगलिक कार्य आरम्भ होते हैं। इस दिन व्रत के रुप में उपवास करने का विशेष महत्त्व है। उपवास न कर सके तो एक समय फलाहार करना चाहिये और संयम-नियमपूर्वक रहना चाहिये। इस तिथि को रात्रि-जागरण का भी विशेष महत्त्व है।
हरि को जगाने के लिये (१) भगवत्सम्बन्धी कीर्तन, वाद्य, नृत्य और पुराणों का पाठ करना चाहिये। धूप, दीप, नैवेद्य, फल और अर्घ्य आदि से पूजा करके घंटा, शंख, मृदंग आदि वाद्यों की मांगलिक ध्वनि तथा निम्म मन्त्रों द्वारा भगवान् को जागने की प्रार्थना करे-
“उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पते।
त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेसिसम्।।
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ वाराह दंष्ट्रोद्धृतवसुन्धर
देवोत्थान, प्रबोधिनी या देव उठनी एकादशी
सुख-शान्ति-दायक महा-लक्ष्मी महा-मन्त्र प्रयोग
सुख-शान्ति-दायक महा-लक्ष्मी महा-मन्त्र प्रयोग
विनियोगः-
ॐ अस्य श्रीपञ्च-दश-ऋचस्य श्री-सूक्तस्य श्रीआनन्द-कर्दम-चिक्लीतेन्दिरा-सुता ऋषयः, अनुष्टुप्-वृहति-प्रस्तार-पंक्ति-छन्दांसि, श्रीमहालक्ष्मी देवताः, श्रीमहा-लक्ष्मी-प्रसाद-सिद्धयर्थे राज-वश्यार्थे सर्व-स्त्री-पुरुष-वश्यार्थे महा-मन्त्र-जपे विनियोगः।
ऋष्यादि-न्यासः-
श्रीआनन्द-कर्दम-चिक्लीतेन्दिरा-सुता ऋषिभ्यो नमः शिरसि। अनुष्टुप्-वृहति-प्रस्तार-पंक्ति-छन्दोभ्यो नमः मुखे। श्रीमहालक्ष्मी देवताय नमः हृदि। श्रीमहा-लक्ष्मी-प्रसाद-सिद्धयर्थे राज-वश्यार्थे सर्व-स्त्री-पुरुष-वश्यार्थे महा-मन्त्र-जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे।
कर-न्यासः-
ॐ हिरण्मय्यै अंगुष्ठाभ्यां नमः। ॐ चन्द्रायै तर्जनीभ्यां स्वाहा। ॐ रजत-स्त्रजायै मध्यमाभ्यां वषट्। ॐ हिरण्य-स्त्रजायै अनामिकाभ्यां हुं। ॐ हिरण्य-स्त्रक्षायै कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्। ॐ हिरण्य-वर्णायै कर-तल-करपृष्ठाभ्यां फट्।
अंग-न्यासः-
ॐ हिरण्मय्यै नमः हृदयाय नमः। ॐ चन्द्रायै नमः शिरसे स्वाहा। ॐ रजत-स्त्रजायै नमः शिखायै वषट्। ॐ हिरण्य-स्त्रजायै नमः कवचाय हुं। ॐ हिरण्य-स्त्रक्षायै नमः नेत्र-त्रयाय वौषट्। ॐ हिरण्य-वर्णायै नमः अस्त्राय फट्।
ध्यानः-
ॐ अरुण-कमल-संस्था, तद्रजः पुञ्ज-वर्णा,
कर-कमल-धृतेष्टा, भीति-युग्माम्बुजा च।
मणि-मुकुट-विचित्रालंकृता कल्प-जालैर्भवतु-
भुवन-माता सततं श्रीः श्रियै नः।।
मानस-पूजनः-
ॐ लं पृथ्वी तत्त्वात्वकं गन्धं श्रीमहा-लक्ष्मी-प्रीतये समर्पयामि नमः।
ॐ हं आकाश तत्त्वात्वकं पुष्पं श्रीमहा-लक्ष्मी-प्रीतये समर्पयामि नमः।
ॐ यं वायु तत्त्वात्वकं धूपं श्रीमहा-लक्ष्मी-प्रीतये घ्रापयामि नमः।
ॐ रं अग्नि तत्त्वात्वकं दीपं श्रीमहा-लक्ष्मी-प्रीतये दर्शयामि नमः।
ॐ वं जल तत्त्वात्वकं नैवेद्यं श्रीमहा-लक्ष्मी-प्रीतये निवेदयामि नमः।
ॐ सं सर्व-तत्त्वात्वकं ताम्बूलं श्रीमहा-लक्ष्मी-प्रीतये समर्पयामि नमः।
।।महा-मन्त्र।।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महा-लक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे, स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।।
ॐ हिरण्य-वर्णां हरिणीं, सुवर्ण-रजत-स्त्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्यमयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह।।१
दारिद्रय-दुःख-भय हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽऽर्द्र-चित्ता।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महा-लक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे, स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।।
तां म आवह जात-वेदो, लक्ष्मीमनप-गामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं, गामश्वं पुरूषानहम्।।२
दारिद्रय-दुःख-भय हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽऽर्द्र-चित्ता।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महा-लक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे, स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।।
अश्वपूर्वां रथ-मध्यां, हस्ति-नाद-प्रमोदिनीम्।
श्रियं देवीमुपह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम्।।३
दारिद्रय-दुःख-भय हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽऽर्द्र-चित्ता।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महा-लक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे, स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।।
कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीं।
पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्।।४
दारिद्रय-दुःख-भय हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽऽर्द्र-चित्ता।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महा-लक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे, स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।।
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देव-जुष्टामुदाराम्।
तां पद्म-नेमिं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणोमि।।५
दारिद्रय-दुःख-भय हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽऽर्द्र-चित्ता।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महा-लक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे, स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।।
आदित्य-वर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽक्ष बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः।।६
दारिद्रय-दुःख-भय हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽऽर्द्र-चित्ता।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महा-लक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे, स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।।
उपैतु मां दैव-सखः, कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्, कीर्ति वृद्धिं ददातु मे।।७
दारिद्रय-दुःख-भय हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽऽर्द्र-चित्ता।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महा-लक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे, स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।।
क्षुत्-पिपासाऽमला ज्येष्ठा, अलक्ष्मीर्नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वान् निर्णुद मे गृहात्।।८
दारिद्रय-दुःख-भय हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽऽर्द्र-चित्ता।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महा-लक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे, स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।।
गन्ध-द्वारां दुराधर्षां, नित्य-पुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरीं सर्व-भूतानां, तामिहोपह्वये श्रियम्।।९
दारिद्रय-दुःख-भय हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽऽर्द्र-चित्ता।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महा-लक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे, स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।।
मनसः काममाकूतिं, वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्नस्य, मयि श्रीः श्रयतां यशः।।१०
दारिद्रय-दुःख-भय हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽऽर्द्र-चित्ता।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महा-लक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे, स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।।
कर्दमेन प्रजा-भूता, मयि सम्भ्रम-कर्दम।
श्रियं वासय मे कुले, मातरं पद्म-मालिनीम्।।११
दारिद्रय-दुःख-भय हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽऽर्द्र-चित्ता।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महा-लक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे, स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।।
आपः सृजन्तु स्निग्धानि, चिक्लीत वस मे गृहे।
निच-देवी मातरं श्रियं वासय मे कुले।।१२
दारिद्रय-दुःख-भय हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽऽर्द्र-चित्ता।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महा-लक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे, स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।।
आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं, सुवर्णां हेम-मालिनीम्।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो ममावह।।१३
दारिद्रय-दुःख-भय हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽऽर्द्र-चित्ता।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महा-लक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे, स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।।
आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं, पिंगलां पद्म-मालिनीम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो ममावह।।१४
दारिद्रय-दुःख-भय हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽऽर्द्र-चित्ता।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महा-लक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे, स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।।
तां म आवह जात-वेदो लक्ष्मीमनप-गामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरूषानहम्।।१५
दारिद्रय-दुःख-भय हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽऽर्द्र-चित्ता।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महा-लक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे, स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।।
यः शुचिः प्रयतो भूत्वा, जुहुयादाज्यमन्वहम्।
श्रियः पंच-दशर्चं च, श्री-कामः सततं जपेत्।।
दारिद्रय-दुःख-भय हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽऽर्द्र-चित्ता।
।।स्तुति-पाठ।।
।।ॐ नमो नमः।।
पद्मानने पद्मिनि पद्म-हस्ते पद्म-प्रिये पद्म-दलायताक्षि।
विश्वे-प्रिये विष्णु-मनोनुकूले, त्वत्-पाद-पद्मं मयि सन्निधत्स्व।।
पद्मानने पद्म-उरु, पद्माक्षी पद्म-सम्भवे।
त्वन्मा भजस्व पद्माक्षि, येन सौख्यं लभाम्यहम्।।
अश्व-दायि च गो-दायि, धनदायै महा-धने।
धनं मे जुषतां देवि, सर्व-कामांश्च देहि मे।।
पुत्र-पौत्र-धन-धान्यं, हस्त्यश्वादि-गवे रथम्।
प्रजानां भवति मातः, अयुष्मन्तं करोतु माम्।।
धनमग्निर्धनं वायुर्धनं सूर्यो धनं वसुः।
धनमिन्द्रा वृहस्पतिर्वरुणो धनमश्नुते।।
वैनतेय सोमं पिब, सोमं पिबतु वृत्रहा।
सोमं धनस्य सोमिनो, मह्मं ददातु सोमिनि।।
न क्रोधो न च मात्सर्यं, न लोभो नाशुभा मतीः।
भवन्ती कृत-पुण्यानां, भक्तानां श्री-सूक्तं जपेत्।।
प्रार्थना
प्रार्थना
“ॐ वाङ्मे मनसि प्रतिष्ठिता, मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः। अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यृतं वदिष्यामि सत्यं वदिष्यामि। तन्मामवतु। तद् वक्तारमवतु। अवतु माम्। अवतु वक्तारमवतु वक्तारम्। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्ति।।”
(ऋग्वेदीय शान्तिपाठ)
‘हे सच्चिदानन्दस्वरुप परमात्मन्, मेरी वाणी मन में स्थित हो जाये और मन वाणी में स्थित हो जाये। हे प्रकाशस्वरुप परमेश्वर, आप मेरे लिये प्रकट हो जाइये। हे मन और वाणी, तुम दोनों मेरे लिये वेदविषयक ज्ञान की प्राप्ति कराने वाले बनो। मेरा गुरुमुख से सुना हुआ और अनुभव में आया हुआ ज्ञान मेरा त्याग न करे- मैं उसे कभी न भूलूँ। मेरी इच्छा है कि अपने अध्ययन द्वारा मैं दिन और रात एक कर दूँ। मैं वाणी से श्रेष्ठ शब्दों का उच्चारण करुँगा, सर्वथा सत्य बोलूँगा। वे परब्रह्म परमात्मा मेरी रक्षा करें। वे मुझे ब्रह्मविद्या सिखाने वाले आचार्य की रक्षा करें, आचार्य की रक्षा करें। आध्यात्मिक, आधिदैविक और आदिभौतिक- तीनों तापों की शान्ति हो।’
“ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्ति।।”
(शुक्लयजुर्वेदीय शान्तिपाठ)
‘वह सच्चिदानन्द परब्रह्म पुरुषोत्तम सब प्रकार से सदा-सर्वदा परिपूर्ण है। यह जगत् भी उस परब्रह्म से पूर्ण ही है; क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तम से ही उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत् पूर्ण होने पर भी वह परब्रह्म परिपूर्ण है। उस पूर्ण में से पूर्ण को निकाल लेने पर भी वह पूर्ण ही बच रहता है। आध्यात्मिक, आधिदैविक और आदिभौतिक- तीनों तापों की शान्ति हो।’
विद्या-प्राप्ति-प्रयोग
विद्या-प्राप्ति-प्रयोग
१॰ “ॐ ह्रीं क्लीं वद-वद वाग्वादिनी-भगवती-सरस्वति, मम जिह्वाग्रे वासं कुरु कुरु स्वाहा।”
२॰ “ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं वाग्वादिनी-देवी सरस्वति, मम जिह्वाग्रे वासं कुरु कुरु स्वाहा।”
विधिः- प्रति-दिन प्रातःकाल उक्त मन्त्र का १०८ बार जप करे। बालकों को छोटी उम्र से इस मन्त्र का जप कराए। परिक्षा, नौकरी में तो इस मन्त्र के जप के द्वारा सफलता प्राप्त होती ही है, साथ ही नेतृत्व के गुण भी उत्पन्न होते हैं और समाज में प्रतिष्ठा एवं यश की प्राप्ति होती है। मन्त्र जप के समय श्वेत-वस्त्र, माला व आसन का प्रयोग करना चाहिए।
मन्त्र के जप के साथ-साथ ‘सरस्वती-चूर्ण’ का भी प्रयोग करे। ‘सरस्वती-चुर्ण’ के लिए आठ जड़ी-बूटियाँ- १॰ गुडची, २॰ अपामार्ग, ३॰ वायविडंग, ४॰ शंख-पुष्पी, ५॰ बच, ६॰ सोंठ, ७॰ शतावरी और ८॰ ब्राह्मी को पंसारी के यहाँ से समान भाग में लेकर चूर्ण बनाएँ। चूर्ण बनाते समय उक्त मन्त्र का स्मरण करता रहे। फिर इस अभिमन्त्रित चूर्ण का नित्य सेवन करे। चूर्ण के साथ समान मात्रा में गो-घृत एवं मिश्री भी लेवे। ‘चूर्ण-सेवन’ के बाद यथा-शक्ति गो-दुग्ध का पान करे। छः मास तक ऐसा करने से बालकों की बुद्धि निश्चित रुप में तीव्र होती है।
प्रदोष-लक्ष्मी-पूजन
प्रदोष-लक्ष्मी-पूजन
सायं-काल यथा-शक्ति पूजा-सामग्री को एकत्र कर पवित्र आसन पर बैठे। आचमन कर दाएँ हाथ में जल-अक्षत-पुष्प लेकर संकल्प करे। यथा- ॐ अस्य रात्रौ आश्विन-मासे-शुक्ल-पक्षे पूर्णिमायां तिथौ अमुक-गोत्रस्य अमुक-शर्मा (वर्मा या दासः) मम सकल-दुःख-दारिद्र्य-निरास-पूर्वक लक्ष्मी-इन्द्र-कुबेर-पूजनं अहं करिष्यामि (करिष्ये।
इसके बाद पूजा-स्थान के द्वार पर एक अष्ट-दल-कमल बनाए और उस पर पुष्प-अक्षत चढ़ाकर ‘द्वार-देवताभ्यो नमः’ कहकर पूजा करे। फिर गन्ध-पुष्प-अक्षत छोड़कर - ॐ द्वारोर्ध्व-भित्तिभ्यो नमः’ कहे। ‘ॐ ब्रह्मणे नमः, ॐ वास्तु-पुरुषाय नमः’ से पुनः पुष्पाक्षत चढ़ाए। तब ‘ॐ भूर्भुवः स्वः हव्य-वाहन, इहागच्छ इह तिष्ठ’ कहकर ‘अग्नि का आवाहन’ करे। पुनः थोड़ा-सा जल, अक्षत, पुष्प लेकर - ”इदं पाद्यं, इदं अनुलेपनं, इदं अक्षतं, एतानि गन्ध-पुष्पाणि, इदं धूपं, इदं दीपं, इदं ताम्बूलं, इदं नैवेद्यं, एते यव-चूर्ण-घृत-शालि-तण्डुलाः, इदमाचमनीयं, एष पुष्पाञ्जलीः। ॐ हव्य-वाहनाय नमः।’ कहकर अर्पित करे।
अब ‘चन्द्र-पूजा’ हेतु पहले चन्द्र-देव का आवाहन करे- “भो पूर्णेन्दो, इहागच्छ इह तिष्ठ, एषोऽर्घ्यः इन्दवे नमः। एतानि पाद्यानि ॐ पूर्णेन्दवे नमः।’ कहकर थोड़ा-सा गन्धाक्षत, पुष्प जल में डालकर ‘पाद्य’ के लिए अर्पित करे। फिर ‘इदं अनुलेपनं, इदं अक्षतं, एतानि गन्ध-पुष्पाणि, इदं धूपं, इदं दीपं’ और इसके बाद दूध और खीर लेकर ‘इदं नैवेद्यं’ कहते हुए पूजा-सामग्री को चन्द्र-देव को अर्पित करे। तब इदं ताम्बूलं, इदं दक्षिणा-द्रव्यं, प्रदक्षिणां समर्पयामि, कहकर भक्ति-सहित प्रणाम करे।
फिर भार्या सहित रुद्र का पूजन करे। पहले आवाहन करे - ॐ सभार्य-रुद्र, इहागच्छ इह तिष्ठ’ कहकर फुजा-स्थान पर पुष्प और अक्षत छोड़े। फिर ‘एतानि पाद्यादीनि समर्पयामि’ एवं ‘ॐ सभार्य-रुद्राय नमः’ कहकर गन्ध-पुष्प चढ़ाए। ‘एते माष-तिल-तण्डुलाः ॐ सभार्य-रुद्राय नमः’ कहकर पूर्वोक्त विधि से धूप-दीप आदि अर्पित करे।
तब ‘स्कन्दाय नमः’ कहकर स्कन्द-देव की पूजा करे। ”इदं पाद्यं, इदं अनुलेपनं, इदं अक्षतं, एतानि गन्ध-पुष्पाणि, इदं धूपं, इदं दीपं, इदं ताम्बूलं, इदं दक्षिणा-द्रव्यं, एते माष-तिल-तण्डुलाः ॐ स्कन्दाय नमः’ कहकर उपलब्ध पूजा-सामग्री अर्पित करे।
पुनः नन्दीश्वर की पूजा करने हेतु - ॐ नन्दीश्वर-मुने, इहागच्छ, इह तिष्ठ, एतानि पाद्यादीनि समर्पयामि। एते माष-तिल-तण्डुलाः ॐ नन्दीशऽवर-मुनये नमः’ कहकर उपलब्ध पूजा-सामग्री अर्पित करे।
इसके बाद ‘ॐ गोमति, इहागच्छ, इह तिष्ठ, एतानि पाद्यादीनि समर्पयामि, ॐ गोमत्यै नमः’ से पूर्व की भाँति पूजा करे।
‘ॐ सुरभि इहागच्छ, इह तिष्ठ, एतानि पाद्यादीनि समर्पयामि। ॐ सुरभ्यै नमः’ से पूजा-सामग्री अर्पित करे।
‘ॐ निकुम्भ इहागच्छ, इह तिष्ठ, एतानि पाद्यादीनि समर्पयामि। ॐ निकुम्भाय नमः’ से पूजा कर माष-तिल-तण्डुल (उड़द-तिल-चावल) दे। इसी प्रकार छाग-वाहन (अग्नि-देव), मेष-वाहन (वरुण), हस्ति-वाहन (विनायक), अश्व-वाहन (रेवन्त) का आवाहन कर पूजा करे। प्रत्येक को उड़द-तिल-चावल का नैवेद्य अर्पित करे।
अब दाएँ हाथ में पुष्प-अक्षत लेकर भगवती लक्ष्मी का ध्यान करे-
ॐ या सा पूद्मासनस्था, विपुल-कटि-तटी, पद्म-दलायताक्षी।
गम्भीरावर्त-नाभिः, स्तन-भर-नमिता, शुभ्र-वस्त्रोत्तरीया।।
लक्ष्मी दिव्यैर्गजेन्द्रैः। मणि-गज-खचितैः, स्नापिता हेम-कुम्भैः।
नित्यं सा पद्म-हस्ता, मम वसतु गृहे, सर्व-मांगल्य-युक्ता।।
उक्त प्रकार ध्यान कर ‘आवाहनादि-पूजन’ करे-
“ॐ भूर्भुवः स्वः लक्ष्मि, इहागच्छ इह तिष्ठ, एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयम्।”
फिर लक्ष्मी की प्रतिमा अथवा यन्त्र की पूजा करे। पहले स्नान कराए-
ॐ मन्दाकिन्या समानीतैः, हेमाम्भोरुह-वासितैः स्नानं कुरुष्व देवेशि, सलिलं च सुगन्धिभिः।। ॐ लक्ष्म्यै नमः।।
तदन्तर ‘इदमनुलिपनं, इदं सिन्दूरं, इदमक्षतं’ से पूजन कर लक्ष्मी देवी को पुष्प-माला और पुष्प अर्पित करे-
‘ॐ मन्दार-पारिजाताद्यैः, अनेकैः कुसुमैः शुभैः। पूजयामि शिवे, भक्तया, कमलायै नमो नमः।। ॐ लक्ष्म्यै नमः, पुष्पाणि समर्पयामि।’
इसके बाद ‘इदं रक्त-वस्त्रं, इदं विल्व-पत्रं, इदं माल्यं, एष धूपं, एष दीपं, एतानि नाना-विधि-नैवेद्यानि, इसमाचनीयं। एतानि नाना-विध-पक्वान्न-सहित-नारिकेलोदक-सहित-नाना-फलानि, ताम्बूलानि, आचमनीयं समर्पयामि’ से पूजा करे।
अन्त में लक्ष्मी जी को तीन पुष्पाञ्जलियाँ प्रदान करे-
“ॐ नमस्ते सर्व-भूतानां, वरदाऽसि हरि-प्रिये, या गतिस्त्वत्-प्रपन्नानां,
सा मे भूयात् त्वद्-दर्शनात्। एष पुष्पाञ्जलिः।। ॐ महा-लक्ष्म्यै नमः।।”
लक्ष्मी का पूजन के बाद ‘इन्द्र-देव’ का ‘ॐ इन्द्राय नमः’ कहकर एवं ‘कुबेर का ‘ॐ कुबेराय नमः’ कहकर गन्धादि से पूजन करे। फिर हाथों में पुष्प लेकर ‘ॐ इन्द्राय नमः’, ‘ॐ कुबेराय नमः’ कहकर प्रणाम करे-
“ॐ धनदाय नमस्तुभ्यं, निधि-पद्माधिपाय च। भवन्तु त्वत्-प्रसादान्ने, धन-धान्यादि-सम्पदः।।”
श्रीविचित्र-वीर-हनुमन्-माला-मन्त्र
श्रीविचित्र-वीर-हनुमन्-माला-मन्त्र
प्रस्तुत ‘विचित्र-वीर-हनुमन्-माला-मन्त्र’ दिव्य प्रभाव से परिपूर्ण है। इससे सभी प्रकार की बाधा, पीड़ा, दुःख का निवारण हो जाता है। शत्रु-विजय हेतु यह अनुपम अमोघ शस्त्र है। पहले प्रतिदिन इस माला मन्त्र के ११०० पाठ १० दिनों तक कर, दशांश गुग्गुल से ‘हवन’ करके सिद्ध कर ले। फिर आवश्यकतानुसार एक बार पाठ करने पर ‘श्रीहनुमानजी’ रक्षा करते हैं। सामान्य लोग प्रतिदिन केवल ११ बार पाठ करके ही अपनी कामना की पूर्ति कर सकते हैं। विनियोग, ऋष्यादि-न्यास, षडंग-न्यास, ध्यान का पाठ पहली और अन्तिम आवृत्ति में करे।
विनियोगः-
ॐ अस्य श्रीविचित्र-वीर-हनुमन्माला-मन्त्रस्य श्रीरामचन्द्रो भगवान् ऋषिः। अनुष्टुप छन्दः। श्रीविचित्र-वीर-हनुमान्-देवता। ममाभीष्ट-सिद्धयर्थे माला-मन्त्र-जपे विनियोगः।
ऋष्यादि-न्यासः-
श्रीरामचन्द्रो भगवान् ऋषये नमः शिरसि। अनुष्टुप छन्दसे नमः मुखे। श्रीविचित्र-वीर-हनुमान्-देवतायै नमः हृदि। ममाभीष्ट-सिद्धयर्थे माला-मन्त्र-जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे।
षडङ्ग-न्यासः-
ॐ ह्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः (हृदयाय नमः)। ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः (शिरसे स्वाहा)। ॐ ह्रूं मध्यमाभ्यां नमः (शिखायै वषट्)। ॐ ह्रैं अनामिकाभ्यां नमः (कवचाय हुं)। ॐ ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः (नेत्र-त्रयाय वौषट्)। ॐ ह्रः करतल-करपृष्ठाभ्यां नमः (अस्त्राय फट्)।
ध्यानः-
वामे करे वैर-वहं वहन्तम्, शैलं परे श्रृखला-मालयाढ्यम्।
दधानमाध्मातमु्ग्र-वर्णम्, भजे ज्वलत्-कुण्डलमाञ्नेयम्।।
माला-मन्त्रः-
“ॐ नमो भगवते, विचित्र-वीर-हनुमते, प्रलय-कालानल-प्रभा-ज्वलत्-प्रताप-वज्र-देहाय, अञ्जनी-गर्भ-सम्भूताय, प्रकट-विक्रम-वीर-दैत्य-दानव-यक्ष-राक्षस-ग्रह-बन्धनाय, भूत-ग्रह, प्रेत-ग्रह, पिशाच-ग्रह, शाकिनी-ग्रह, डाकिनी-ग्रह ,काकिनी-ग्रह ,कामिनी-ग्रह ,ब्रह्म-ग्रह, ब्रह्मराक्षस-ग्रह, चोर-ग्रह बन्धनाय, एहि एहि, आगच्छागच्छ, आवेशयावेशय, मम हृदयं प्रवेशय प्रवेशय, स्फुट स्फुट, प्रस्फुट प्रस्फुट, सत्यं कथय कथय, व्याघ्र-मुखं बन्धय बन्धय, सर्प-मुखं बन्धय बन्धय, राज-मुखं बन्धय बन्धय, सभा-मुखं बन्धय बन्धय, शत्रु-मुखं बन्धय बन्धय, सर्व-मुखं बन्धय बन्धय, लंका-प्रासाद-भञ्जक। सर्व-जनं मे वशमानय, श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं सर्वानाकर्षयाकर्षय, शत्रून् मर्दय मर्दय, मारय मारय, चूर्णय चूर्णय, खे खे श्रीरामचन्द्राज्ञया प्रज्ञया मम कार्य-सिद्धिं कुरु कुरु, मम शत्रून् भस्मी कुरु कुरु स्वाहा। ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः फट् श्रीविचित्र-वीर-हनुमते। मम सर्व-शत्रून् भस्मी-कुरु कुरु, हन हन, हुं फट् स्वाहा।।”
(प्रति-दिनमेकादश-वारं जपेत्। पूर्व-न्यास-ध्यान-पूर्वकं निवेदयेत्)
कलश एवं जयन्ती का माहात्म्य
कलश एवं जयन्ती का माहात्म्य
माँ दुर्गा की पूजा का शुभारम्भ ‘कलश’-स्थापना से होता है। स्थापना हेतु ‘कलश’ स्वर्ण, चाँदी, पीतल, ताम्र अथवा मिट्टी का होना चाहिए। ‘कलश’ देखने में सुडौल और पवित्र होने चाहिए। मिट्टी के ऐसे ‘कलश’ प्रयोग में नहीं लाने चाहिए, जिनमें छिद्र होने की सम्भावना हो।विशेष अनुष्ठान करना हो, तो धातु के ‘कलश’ का ही स्थापन करना चाहिए।
‘कलश’ में गंगा-जल, तीर्थ-जल, नदी का जल, तालाब का जल, झील का जल अथवा जिस कूप का ‘याग’ हुआ हो, उसका जल प्रयोग में ला सकते हैं। ‘कलश’ के नीचे ‘सप्त-मृत्तिका’ (१॰ अश्व, २॰ गज, ३॰ गो-शाला, ४॰ वल्मीक-दीमक की बाँबी, ५॰ नदी-संगम, ६॰ तराई तथा ७॰ राज-द्वार की मिट्टी) रखनी चाहिए। कलश में सर्वौषधि (मुरा, जटामासी, वच, कूट, हल्दी, दारु-हल्दी, कचूर, चम्पा तथा नागर मोथा) रखनी चाहिए। साथ ही, पञ्च-रत्न, पञ्च-पल्लव (आम, पलाश, बरगद, पीपल तथा चकिल), पूँगीफल (सुपारी) भी श्रद्धा-पूर्वक रखनी चाहिए। यदि कोई सामग्री उपलब्ध न हो, तो उसके स्थान पर ‘अक्षत’ चढ़ाने का विधान है। उदाहरण का लिये-यदि ‘सप्त-मृत्तिका’ नहीं मिल पाती, तो निम्न मन्त्र से अक्षत चढ़ाना चाहिए- “सप्त-मृत्तिका-स्थाने अक्षतं समर्पयामि”
‘कलश के नीचे शुद्ध मिट्टी में विशुद्ध ‘जौ’ को बोना चाहिए। ‘जौ’ को आदि-अन्न माना जाता है। ‘जौ’ के पौधे को ‘जयन्ती’ कहते हैं। ‘जयन्ती’ से अनुष्ठान की सफलता का निर्धारण होता है।
अनुष्ठान-काल में इसे नित्य पवित्र जल से सींचना चाहिए। अनुष्ठान-काल की समाप्ति पर इसे माँ के मुकुट पर और भुजा पर चढ़ाते हैं, फिर अपने मस्तक पर धारण करते हैं।
अनुष्ठान के बाद ‘कलश’ के जल तथा ‘जयन्ती’ का माहात्म्य विविध कार्यों हेतु इस प्रकार है-
१॰ कलश-जल का माहात्म्य
- ‘कलश’ के जल से मस्तक पर अभिषेक करने से सभी प्रकार की अभिलाषा पूरी होती है।
- ‘कलश’ के जल को पिलाने से असमय में ‘गर्भ-पात’ नहीं होता है तथा जिन्हें गर्भ-धारण नहीं होता, उन्हें लाभ होता है।
- ‘कलश’ के जल को वृक्षों, फसल, गो-शाला आदि में डालने से वृक्ष खूब फलरे-फूलते हैं, फसल की वृद्धि होती है और गाँए पर्याप्त मात्रा में दूध देती हैं।
- ‘कलश’ के जल को घर में छिड़कने से ‘प्रेत-बाधा‘ का निवारण होता है।
- ‘कलश’ के जल को रोगी के मस्तक पर छिड़कने से रोग का निवारण होता है।
- ‘कलश’ के जल से मन्द बुद्धि वाले छात्र या छात्रओं का अभिषेक करने से ऊनकी बुद्धि का विकास होता है।
२॰ जयन्ती का माहात्म्य
ऐसी जयन्ती, जिसे ‘शारदीय नवरात्र’ में ‘हस्त-नक्षत्र’ में बोया गया हो और ‘श्रवण नक्षत्र‘ में काटा गया हो, उसका माहात्म्य विभिन्न कार्यों में प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। यथा-
‘विजयादशमी‘ के दिन माथे पर धारण करने से वर्ष भर सभी क्षेत्रों में विजय प्राप्त होती है।
‘जयन्ती’ को यन्त्र में मढ़ाकर गले अथवा भुजा पर धारण कर कोर्ट आदि में जाने से विजय-प्राप्ति होती है।
‘प्रेत-बाधा-ग्रसित’ व्यक्ति को ‘यन्त्र’ में मढ़ाकर धारण करवाने से प्रेत-बाधा शान्त होती है।
‘जयन्ती’ को कैश-बाक्स, मनी-बैग आदि में रखने से धन-प्राप्ति होती है।
धारण-विधि- ‘जयन्ती’ धारण करने के लिये सोने, चाँदी, ताम्बे अथवा अष्ट-धातु का ताबीज बनवाना चाहिए। जयन्ती को गंगा-जल से धोकर इसमें रखकर बन्द कर देना चाहिए। इसके बाद यन्त्र को स्पर्श करते हुए ‘प्राण-प्रतिष्ठा-मन्त्र’ तीन बार पढ़ना चाहिए। तथा-
“ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हौं हंसः यन्त्र-राजस्य प्राणा इह प्राणाः। ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हौं हंसः यन्त्र-राजस्य जीव इह स्थितः। ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हौं हंसः यन्त्र-राजस्य सर्वेन्द्रियाणि इह स्थितानि। ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हौं हंसः यन्त्र-राजस्य वाङ्-मनस्त्वक्-चक्षुः श्रोत्र-जिह्वा-घ्राण-पाद-पायूपस्थानि इहैवागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा।”
फिर ‘यन्त्र का पञ्चोपचार-पूजन कर लाल रेशमी धागे में गूँथ कर निम्न मन्त्र को पढ़ते हुए गले अथवा भुजा पर धारण करे। नारी वाम-भुजा पइर और पुरुष दाहिनी भुजा पर धारण करे। धारण किए हुए यन्त्र को उतारना नहीं चाहिए। धारण-मन्त्र इस प्रकार है-
“जयन्ती मंगला काली, भद्र-काली कलालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री, स्वधा स्वाहा नमोऽस्तु ते।।”
३॰ सिद्धि-असिद्धि की तत्काल परीक्षा
‘सिद्धान्तशेखर’ के अनुसार स्थापना के तीसरे की दिन यवांकुर (जयन्ती) के दर्शन हो जाने चाहिए।
इन यवांकुरों की बढ़ोत्तरी व प्रफुल्लता पर कार्य सिद्धि की परीक्षा होती है। ‘अवृष्टिं कुरुते कृष्ण, धूम्राभं कलहं तथा’ अर्थात् काले अंकुर उगने पर उस वर्ष अनावृष्टि, निर्धनता, धूयें की आभा वाले होने पर परिवार में कलह। न उगने पर जननाश, मृत्यु व कार्यबाधा। नीले रंग से दुर्भिक्ष (अकाल) समझें। रक्त वर्ण के होने पर रोग, व्याधि व शत्रुभय समझें। हरा रंग पुष्टिवर्धक तथा लाभप्रद है तथा श्वेत दूर्वा अत्यन्त शुभफलकारी व शीघ्र लाभदायक मानी गई है। आधी हरी व पीली दूर्वा उत्पन्न होने पर पहले कार्य होगा, किन्तु बाद में हानि होगी।
अशुभ दूर्वा के उत्पन्न होने पर आठवें दिन ‘शांति होम’ द्वारा उनका हवन किया जाता है। श्वेत दूर्वा पर अन्य कई तांत्रिक प्रयोगों का उल्लेख तन्त्रशास्त्र में मिलता है।
रुप-सप्त-श्लोकी चण्डी
सर्वाभीष्ट-दायक
रुप-सप्त-श्लोकी चण्डी
संकल्पः-
ॐ तत्सत् अद्यैतस्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय-प्रहरार्द्धे श्वेत-वराह-कल्पे जम्बू-द्वीपे भरत-खण्डे आर्यावर्त्त-देशे अमुक-पुण्य-क्षेत्रे कलि युगे कलि-प्रथम-चरणे अमुक-संवत्सरे अमुक-मासे अमुक-पक्षे अमुक-तिथौ अमुक-वासरे अमुक-गोत्रोत्पन्नो अमुक-नाम-शर्मा (वर्मा-गुप्तो-दासो वाऽहं) श्रीमहा-काली-महा-लक्ष्मी-महा-सरस्वती-देवता-प्रीति-पूर्वक सर्वाभीष्ट-सिद्धयर्थं रुपं देहीति संयोज्य नवार्ण-मनुना सह सप्त-श्लोकी चण्डी-मन्त्रस्य अमुक-संख्यक-जपं करिष्यामि।
ध्यानः-
ॐ विद्युद्-दाम-सम-प्रभां मृग-पति-स्कन्ध-स्थितां भीषणाम्,
कन्याभिः करवाल-खेट-विलसद्-हस्ताभिरासेविताम्।
हस्तैश्चक्र-गदाऽसि-खेट-विशिखाँश्चापं गुणं तर्जनीम्,
विभ्राणामनलात्मिकां शशि-धरां दुर्गां त्रिनेत्रां भजे।।
मानस-पूजनः-
उक्त प्रकार ‘ध्यान’ करने के बाद माँ दुर्गा का मानसिक पूजन करे-
ॐ लं पृथ्वी-तत्त्वात्मकं गन्धं श्रीजगदम्बा-दुर्गा-प्रीतये समर्पयामि नमः। ॐ हं आकाश-तत्त्वात्मकं पुष्पं श्रीजगदम्बा-दुर्गा-प्रीतये समर्पयामि नमः। ॐ यं वायु-तत्त्वात्मकं धूपं श्रीजगदम्बा-दुर्गा-प्रीतये घर्पायामि नमः। ॐ रं अग्नि-तत्त्वात्मकं दीपं श्रीजगदम्बा-दुर्गा-प्रीतये दर्शयामि नमः। ॐ वं जल-तत्त्वात्मकं नैवेद्य श्रीजगदम्बा-दुर्गा-प्रीतये निवेदयामि नमः। ॐ शं सर्व-तत्त्वात्मकं ताम्बूलं श्रीजगदम्बा-दुर्गा-प्रीतये समर्पयामि नमः।
मानस-पूजन करने के बाद ‘रुपं देहीति’ संयोज्य ‘नवार्ण मन्त्र सहित ‘सप्त-श्लोकी चण्डी का जप करे। यथा-
१॰
रुपं देहि यशो देहि, भगं भगवति, देहि मे। पुत्रान् देहि धनं देहि, सर्वान् कामाँश्च देहि मे।
महिषघ्नि महा-माये, चामुण्डे मुण्ड-मालिनि, आयुरारोग्यमैश्वर्यं, देहि देवि, नमोस्तुऽते।।
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे
ज्ञानिनामपि चेतांसि, देवी भगवती हि सा। बलादाकृष्य मोहाय, महा-माया प्रयच्छति।।१
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे
रुपं देहि यशो देहि, भगं भगवति, देहि मे। पुत्रान् देहि धनं देहि, सर्वान् कामाँश्च देहि मे।
महिषघ्नि महा-माये, चामुण्डे मुण्ड-मालिनि, आयुरारोग्यमैश्वर्यं, देहि देवि, नमोस्तुऽते।।
२॰
रुपं देहि यशो देहि, भगं भगवति, देहि मे। पुत्रान् देहि धनं देहि, सर्वान् कामाँश्च देहि मे।
महिषघ्नि महा-माये, चामुण्डे मुण्ड-मालिनि, आयुरारोग्यमैश्वर्यं, देहि देवि, नमोस्तुऽते।।
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे
दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।
दारिद्रय-दुःख-भय-हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽऽर्द्र-चित्ता।।२
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे
रुपं देहि यशो देहि, भगं भगवति, देहि मे। पुत्रान् देहि धनं देहि, सर्वान् कामाँश्च देहि मे।
महिषघ्नि महा-माये, चामुण्डे मुण्ड-मालिनि, आयुरारोग्यमैश्वर्यं, देहि देवि, नमोस्तुऽते।।
३॰
रुपं देहि यशो देहि, भगं भगवति, देहि मे। पुत्रान् देहि धनं देहि, सर्वान् कामाँश्च देहि मे।
महिषघ्नि महा-माये, चामुण्डे मुण्ड-मालिनि, आयुरारोग्यमैश्वर्यं, देहि देवि, नमोस्तुऽते।।
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे
सर्व-मंगल-मंगल्ये, शिवे-सर्वार्थ-साधिके,
शरण्ये-त्र्यम्बके-गौरि, नारायणि नमोस्तुऽते।।३
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे
रुपं देहि यशो देहि, भगं भगवति, देहि मे। पुत्रान् देहि धनं देहि, सर्वान् कामाँश्च देहि मे।
महिषघ्नि महा-माये, चामुण्डे मुण्ड-मालिनि, आयुरारोग्यमैश्वर्यं, देहि देवि, नमोस्तुऽते।।
४॰
रुपं देहि यशो देहि, भगं भगवति, देहि मे। पुत्रान् देहि धनं देहि, सर्वान् कामाँश्च देहि मे।
महिषघ्नि महा-माये, चामुण्डे मुण्ड-मालिनि, आयुरारोग्यमैश्वर्यं, देहि देवि, नमोस्तुऽते।।
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे
शरणागत-दीनार्त-परित्राण-परायणे, सर्वस्यार्ति-हरे-देवि नारायणि नमोस्तुऽते।।४
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे
रुपं देहि यशो देहि, भगं भगवति, देहि मे। पुत्रान् देहि धनं देहि, सर्वान् कामाँश्च देहि मे।
महिषघ्नि महा-माये, चामुण्डे मुण्ड-मालिनि, आयुरारोग्यमैश्वर्यं, देहि देवि, नमोस्तुऽते।।
५॰
रुपं देहि यशो देहि, भगं भगवति, देहि मे। पुत्रान् देहि धनं देहि, सर्वान् कामाँश्च देहि मे।
महिषघ्नि महा-माये, चामुण्डे मुण्ड-मालिनि, आयुरारोग्यमैश्वर्यं, देहि देवि, नमोस्तुऽते।।
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे
सर्व-स्वरुपे, सर्वेशे सर्व-शक्ति-समन्विते।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि, दुर्गे देवि नमोस्तुऽते।।५
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे
रुपं देहि यशो देहि, भगं भगवति, देहि मे। पुत्रान् देहि धनं देहि, सर्वान् कामाँश्च देहि मे।
महिषघ्नि महा-माये, चामुण्डे मुण्ड-मालिनि, आयुरारोग्यमैश्वर्यं, देहि देवि, नमोस्तुऽते।।
६॰
रुपं देहि यशो देहि, भगं भगवति, देहि मे। पुत्रान् देहि धनं देहि, सर्वान् कामाँश्च देहि मे।
महिषघ्नि महा-माये, चामुण्डे मुण्ड-मालिनि, आयुरारोग्यमैश्वर्यं, देहि देवि, नमोस्तुऽते।।
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा, रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणाम्, त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति।।६
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे
रुपं देहि यशो देहि, भगं भगवति, देहि मे। पुत्रान् देहि धनं देहि, सर्वान् कामाँश्च देहि मे।
महिषघ्नि महा-माये, चामुण्डे मुण्ड-मालिनि, आयुरारोग्यमैश्वर्यं, देहि देवि, नमोस्तुऽते।।
७॰
रुपं देहि यशो देहि, भगं भगवति, देहि मे। पुत्रान् देहि धनं देहि, सर्वान् कामाँश्च देहि मे।
महिषघ्नि महा-माये, चामुण्डे मुण्ड-मालिनि, आयुरारोग्यमैश्वर्यं, देहि देवि, नमोस्तुऽते।।
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे
सर्वा-बाधा-प्रशमनं, त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्-वैरि-विनाशनम्।।७
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे
रुपं देहि यशो देहि, भगं भगवति, देहि मे। पुत्रान् देहि धनं देहि, सर्वान् कामाँश्च देहि मे।
महिषघ्नि महा-माये, चामुण्डे मुण्ड-मालिनि, आयुरारोग्यमैश्वर्यं, देहि देवि, नमोस्तुऽते।।
सर्वाभीष्टप्रद-प्रयोग
सर्वाभीष्टप्रद-प्रयोग
‘कुमारी-पूजन’ का प्रस्तुत प्रयोग अनुभूत सिद्ध प्रयोग है। सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्णता इस ‘प्रयोग’ द्वारा सम्भव है।
१॰ पहले संकल्प करे। यथा- ॐ तत् सत्। अद्यैतस्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय प्रहरार्धे, श्री श्वेत-वाराह-कल्पे, जम्बु-द्वीपे, भरत-खण्डे, अमुक-प्रदेशान्तर्गते, अमुक पुण्य-क्षेत्रे, कलियुगे, कलि-प्रथम-चरणे, अमुक-नाम-सम्वत्सरे, अमुक-मासे, अमुक-पक्षे, अमुक-तिथौ, अमुक-वासरे, अमुक-गोत्रोत्पन्नो, अमुक-नाम-शर्माऽहं (वर्माऽहं, दासोऽहं वा), सर्वापत् शान्ति-पूर्वक ममाभीष्ट-सिद्धये, गणेश-वटुकादि-सहितां कुमारी-पूजां करिष्ये।
२॰ फिर ‘गं गणपतये नमः’ मन्त्र से भगवान् गणेश का पूजन करे। यथा- १॰ गं गणपतये नमः पादयोः पाद्यं समर्पयामि। २॰ गं गणपतये नमः शिरसि अर्घ्यं समर्पयामि। ३॰ गं गणपतये नमः गन्धाक्षतं समर्पयामि। ४॰ गं गणपतये नमः पुष्पं समर्पयामि। ५॰ गं गणपतये नमः धूपं घ्रापयामि। ६॰ गं गणपतये नमः दीपं दर्शयामि। ७॰ गं गणपतये नमः नैवेद्यं समर्पयामि। ८॰ गं गणपतये नमः आचमनीयं समर्पयामि। ९॰ गं गणपतये नमः ताम्बूलं समर्पयामि। १०॰ गं गणपतये नमः दक्षिणां समर्पयामि।
३॰ भगवान् गणेश का पूजन करने के पश्चात् “ॐ वं वटुकाय नमः” मन्त्र से भगवान् वटुक का पूजन करे। यथा- १॰ ॐ वं वटुकाय नमः पादयोः पाद्यं समर्पयामि। २॰ ॐ वं वटुकाय नमः शिरसि अर्घ्यं समर्पयामि। ३॰ ॐ वं वटुकाय नमः गन्धाक्षतं समर्पयामि। ४॰ ॐ वं वटुकाय नमः पुष्पं समर्पयामि। ५॰ ॐ वं वटुकाय नमः धूपं घ्रापयामि। ६॰ ॐ वं वटुकाय नमः दीपं दर्शयामि। ७॰ ॐ वं वटुकाय नमः नैवेद्यं समर्पयामि। ८॰ ॐ वं वटुकाय नमः आचमनीयं समर्पयामि। ९॰ ॐ वं वटुकाय नमः ताम्बूलं समर्पयामि। १०॰ ॐ वं वटुकाय नमः दक्षिणां समर्पयामि।
४॰ तब ‘कुमारी-पूजन’ करे। कुमारी के पैर धोकर उसे प्रेम-पूर्वक अपने सम्मुख आसन पर बैठाए। फिर दोनों हाथ जोड़कर भक्ति-पूर्वक ध्यान करे। यथा-
बाल-रुपां च त्रैलोक्य-सुन्दरीं वर-वर्णिनीम्।
नानालंकार-नम्रांगीं, भद्र-विद्या-प्रकाशिनीम्।।
चारु-हास्यां महाऽऽनन्द-हृदयां चिन्तये शुभाम्।।
अर्थात् बाल-स्वरुपवाली, त्रिलोक-सुन्दरी, श्रेष्ठ वर्णवाली, विविध प्रकार के आभूषणों से सुसज्जित होने से विनम्र शरीरवाली, कल्याण-कारिणी विद्या को प्रकट करनेवाली, सुन्दर हँसी हँसनेवाली, परमानन्द से युक्त हृदयवाली कल्याणकारिणी कुमारी देवी का मैं ध्यान करता हूँ।
५॰ ध्यान करने के बाद निम्नलिखित मन्त्र श्रद्धापूर्वक पढ़कर आवाहन करे-
“ॐ मन्त्राक्षर-मयीं लक्ष्मीं, मातृणां रुप-धारिणीम्।
नव-दुर्गात्मिकां साक्षात्, कन्यामावाहयाम्यहम्।।”
अर्थात् मन्त्राक्षरों से संयुक्ता, लक्ष्मी-स्वरुपा, मातृकाओं का रुप धारण करने वाली, साक्षात् नव-दुर्गा-स्वरुपा कन्या देवी का मैं आवाहन करता हूँ।
आवाहन करने के बाद, सम्मुख उपस्थित कुमारी का पाद्य, अर्घ्य, गन्धाक्षत्, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, आचमन, ताम्बूल एवं दक्षिणा आदि उपचारों से पूजन करे। कुमारी का पूजन करने के बाद निम्न मन्त्र पढ़ते हुए सण्डवत् प्रणाम करे-
“जगद्-वन्द्ये, जगत्-पूज्ये, सर्व-शक्ति-स्वरुपिणि।
पूजां गृहाण कौमारि जगन्मातर्नमोऽस्तु ते।।”
अर्थात् हे विश्व-वन्द्ये, संसार-पूज्ये, सर्व-शक्ति-स्वरुपे कौमारि देवि, मेरी पूजा स्वीकर करिए। हे जगदम्ब, आपको नमस्कार।
६॰ कुमारी-पूजा के बाद “श्रीदुर्गा-अष्टोत्तर-शतनाम” स्तोत्र का पाठ करे।
विशेषः- उपर्युक्त विधि से मास में एक बार ‘कुमारी-पूजा’ करे। कुमारियाँ विषम-संख्यक (१, ३, ५, ७॰॰॰) होनी चाहिए।




